Thursday, 16 August 2018

छोटे आदमी की मृत पोस्ट को श्रद्धांजलि




(गौरी लंकेश की दिन दिहाडे नृशंस हत्या के बाद उपजी आत्मग्लानि पर..)

कुछ लिख कर
रहने ही दिया...

या जो लिखा
कुछ ज्यादा ही संकेतों मे
अर्थहिन..

एक आध बार
तो पोस्ट करके भी
हटा ली अपनी
मामूली टिप्पणी....

डीलिट करने पर
मरते नहीं विचार
मन के अंधेरे या
कच्ची नींद के सपनो
मे भटकती है
उनकी आत्मा ।

रोज थोड़ा थोड़ा
करके मरने से
बेहतर है
गौरी की तरह
सीने मे
दो गोली खा
कर भी खडे रहना..

पहले ऐसा नहीं था
शायद ही कभी
पत्नी ने
देखी हो मेरी पोस्ट
अब नहीं चाहती
मै लिखूं इन लौगो
के खिलाफ कुछ
हर समय अनचाहा भय

क्यों गुमसुम
बैठे रहते हो
इस कम्प्यूटर के आगे
छोडो इन सब को
आपके कुछ लिख देने से
बदलेगा नहीं कुछ

देखो पौधों मे
कुछ नए
पत्ते आऐ है...

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