लाईक एक बटन है
भावना नहीं.....
जरुरी नहीं सच में ही
किया हो लाईक ।
कई लोग
कई - और कारणों
से भी दबाते है
लाईक बटन
कुछ लोग
खरीद भी लेते है
लाईक ।
सेल्फी, फोटोशाप
और ईमौजी
से दिख सकते है
सुन्दर और खुश ।
हजारों मित्र, मुखर प्रतिक्रियाएं
और कोसों दूर
कोने मे
स्क्रीन के आगे
अकेला बैठा आदमी ।
सूने और आऊट आफ फैशन
हो गये
मिलने के अड्डे
ढूँढता हूँ.......
सूने खड़े नीम
पर
बच्चों का कोलाहल
और निबौरीयां ,
याद आती है वह
थडी़ की चाय ।
रात को छतों से
एक दूसरे के जाना
बतियाना घन्टों
बड़ा नेटवर्क
था हमारा ।
भोर की घास पर
ओस की बूंदें.....।
शर्मिला इन्द्र धनुष....।
सर्दी की धूप....।
अरसा हो गया
इनसे मिले ।
जीवन पर एक कृत्रिम
पॉलीथिन की परत
वाल के उस पार
बैठी है.....
उदास पत्नी
शायद ही कभी
संवारती हो चेहरा
बेफिजूल ।
न जाने कहाँ
गये है बच्चे ?
खो गयी है
उनकी मासूम मुस्कान
जिसे मैं सच में
करता था लाईक ।
मन करता है
इस अधेड़ उम्र मे
गली में भागूं
बेफिक्र
किसी कटी पंतग
के पीछे ।
घर ले आऊं
थोड़ा सा इन्द्रधनुष,
कुछ मूंगफलियां
और
थोड़े से मित्र......।
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