Saturday, 25 August 2018

बच्चों के सवाल...






यूँ आसान
नहीं होता
बच्चों के मासूम
सवालों के जवाब
उस क्षण
बचा तो जा सकता है
कुछ झूठी दिलासा से
पर उसका
मासूम सच्चा मन
सबकुछ
देख रहा होता है
हमसे कहीं ज़्यादा
संवेदनशील है उसकी
इन्द्रियाँ
यूँ आसान भी
नहीं होता
उसकी सच्ची आँखो
के आगे कुछ
झूठ बोल पाना
जल्द ही
उतर जाती है
इन झूठी दिलासाआें
की पपड़ियाँ
झूठ से भरे
रिश्तों मे
कहीं बच्चा
यह न मान ले
इस दुनिया में
सभी बोलते है झूठ

Thursday, 23 August 2018

मच्छर जैसे...

बचने की लाख
कोशिशों के
बावजूद

बहुत शातिर
तरीके से
चुपचाप
घुस आते है
आपके घरों के
भीतर तक

सबकुछ
सामान्य सा
दिखता है
उनकी मौजूदगी
के बावजूद

कब उतार दे
जानलेवा जहर
नसों मे
पता भी
नहीं चलता
धीरे धीरे
फैलता जहर
हावी होने
लगता है
दिलो दिमाग पर

कमजोर होती है
बच्चों की
प्रतिरोधक क्षमता ।

हत्यारे जानते है
अपना काम।

Thursday, 16 August 2018

छोटे आदमी की मृत पोस्ट को श्रद्धांजलि




(गौरी लंकेश की दिन दिहाडे नृशंस हत्या के बाद उपजी आत्मग्लानि पर..)

कुछ लिख कर
रहने ही दिया...

या जो लिखा
कुछ ज्यादा ही संकेतों मे
अर्थहिन..

एक आध बार
तो पोस्ट करके भी
हटा ली अपनी
मामूली टिप्पणी....

डीलिट करने पर
मरते नहीं विचार
मन के अंधेरे या
कच्ची नींद के सपनो
मे भटकती है
उनकी आत्मा ।

रोज थोड़ा थोड़ा
करके मरने से
बेहतर है
गौरी की तरह
सीने मे
दो गोली खा
कर भी खडे रहना..

पहले ऐसा नहीं था
शायद ही कभी
पत्नी ने
देखी हो मेरी पोस्ट
अब नहीं चाहती
मै लिखूं इन लौगो
के खिलाफ कुछ
हर समय अनचाहा भय

क्यों गुमसुम
बैठे रहते हो
इस कम्प्यूटर के आगे
छोडो इन सब को
आपके कुछ लिख देने से
बदलेगा नहीं कुछ

देखो पौधों मे
कुछ नए
पत्ते आऐ है...

Wednesday, 15 August 2018

लाईक एक बटन है

लाईक एक बटन है
भावना नहीं.....
जरुरी नहीं सच में ही
किया हो लाईक ।

कई लोग
कई - और कारणों
से भी दबाते है
लाईक बटन
कुछ लोग
खरीद भी लेते है
लाईक ।

सेल्फी, फोटोशाप
और ईमौजी
से दिख सकते है
सुन्दर और खुश ।

हजारों मित्र, मुखर प्रतिक्रियाएं
और कोसों दूर
कोने मे
स्क्रीन के आगे
अकेला बैठा आदमी ।

सूने और आऊट आफ फैशन
हो गये
मिलने के अड्डे
ढूँढता हूँ.......
सूने खड़े नीम
पर
बच्चों का कोलाहल
और निबौरीयां ,
याद आती है वह
थडी़ की चाय ।


रात को छतों से
एक दूसरे के जाना
बतियाना घन्टों
बड़ा नेटवर्क
था हमारा ।

भोर की घास पर
ओस की बूंदें.....।
शर्मिला इन्द्र धनुष....।
सर्दी की धूप....।
अरसा हो गया
इनसे मिले ।

जीवन पर एक कृत्रिम
पॉलीथिन की परत

वाल के उस पार
बैठी है.....
उदास पत्नी
शायद ही कभी
संवारती हो चेहरा
बेफिजूल ।

न जाने कहाँ
गये है बच्चे ?
खो गयी है
उनकी मासूम मुस्कान
जिसे मैं सच में
करता था लाईक ।

मन करता है
इस अधेड़ उम्र मे
गली में भागूं
बेफिक्र
किसी कटी पंतग
के पीछे ।
घर ले आऊं
थोड़ा सा इन्द्रधनुष,
कुछ मूंगफलियां
और
थोड़े से मित्र......।

द स्टारी नाईट और सुशांत सिंह राजपूत 14 जून को जब सुशांत सिंह राजपूत हमारे बीच से अचानक नाराज या क्षुब्ध हो कर चले गए। हम सब उस दुनिया ...